Friday, December 15, 2017

चीन की 19वीं पार्टी कांग्रेस का विश्लेषण

Jayadeva Ranade 

पहले ही चीन के किसी अन्य वामपंथी दल के नेता की तुलना में अधिक और लगभग चौदह औपचारिक पद सँभालते हुए सीसीपी सीसी महासचिव शी जिनपिंग, जैसी की उम्मीद की जा रही थी, उससे भी कई गुना ज्यादा शक्तिशाली रूप से सामने उभर कर आये है. भ्रष्टाचार-विरोधी अभियान का कुशल इस्तेमाल करते हुए उन्होंने पार्टी और सेना से विपक्ष को लगभग साफ़ ही कर दिया है और जियांग जेमिन जैसे विरोधी को हटा कर, अपना वर्चस्व बेहद प्रभावी रूप से जमा लिया है. 2017 में सरकारी चीनी मीडिया ने यह बयान जारी किये थे कि लगभग 176 सीसीपी कैडर जिनमे कि उप-मंत्री जैसे कई ऊंचे पद भी शामिल है, पर स्थित नेताओ को भ्रष्टाचार के आरोप में अपने पद से इस्तीफा देने के बाद गिरफ्तार किया गया. ऐसा ही कुछ पीपल्स लिबरेशन आर्मी के 14,000 से अधिक अधिकारीयों के साथ किया गया. पीएलए में उच्च पदों पर विराजमान लगभग 120 अधिकारीयों को निलंबित अथवा सेवा-निवृत किया गया.
कांग्रेस से कुछ हफ़्तों पहले- शी जिनपिंग ने अपने पद और अधिकार का सार्वजनिक प्रदर्शन करते हुए शीर्ष रैंक के दो जनरलों (फेंग फेंगुई और जहाँग येंग) को गिरफ्तार करवाया. इसके साथ ही उन्होंने बीस नये जनरल अधिकारियों को तेरह नये सैन्य-समूह के नेतृत्व की कमान सौपी और पीएलए नौसेना एवं थल सेना में निजी चुनाव के आधार पर व्यक्तियों को शीर्ष पदों पर भर्ती किया गया. एक दुर्लभ कदम उठाते हुए, चोंगकिंग नगरपालिका द्वारा प्रस्तावित तेरह सदस्यों की सूची को पूरी तरह जिनपिंग ने नकार दिया जिससे प्रतिनिधियों की कुल संख्या घटकर 2287 ही रह गयी है. कांग्रेस के गठन से कुछ समय पूर्व अन्य सात लोगों को भी निलंबित कर दिया गया. पोलिटब्यूरो सदस्य और चोंगकिंग पार्टी के सचिव सुन ज़्हेन्ग्का्य ने पोलितब्यूरो स्टैंडिंग कमेटी के लिए एक प्रत्याशी का चुनाव भी किया था जिसे कुछ आरोपों के चलते निष्काषित कर दिया गया. फरवरी में ही प्रत्याशी को कैद में रहे पूर्व सदस्य बो शिलाई की लोकप्रियता को कम करने के लिए गंभीर प्रयास न करने के संदर्भ में चेतावनी दी गयी गयी थी.
शी जिनपिंग नवम्बर 2012 से खुद को उभारने के प्रयास लगातार कर रहे है. उदारहण के लिए, पीपल्स डेली जियांग जेमिन के कार्यकाल में उनको केंद्र में रखते हुए लगभग 3000 खबर प्रति वर्ष छापता था. हु जिंताओ के कार्यकाल में यही आंकड़ा 2000 खबर प्रति-वर्ष पहुँचा और आज शी जिनपिंग के कार्यकाल में ये लगभग 5000 खबर प्रति वर्ष पहले ही छापता है जिनमे शी जिनपिंग का जिक्र होता है.
बीजिंग में हफ्ते भर तक चलने वाली सीसीपी की 19वीं कांग्रेस (8 अक्टूबर-24 अक्टूबर 2017) के दौरान भी शी जिनपिंग को चीनी वामपंथी विचारधारा में उनके योगदान के लिए सराहा गया. ‘नये दौर में चीनी विशेषताओं से परिपूर्ण शी जिनपिंग के समाजवाद पर विचार’ को कांग्रेस द्वारा सर्वसम्मति से पार्टी के नये संविधान में सम्मिलित कर लिया गया. वे पहले ऐसे नेता है जिन्होंने अपने जीवनकाल में ही पार्टी के समिधान में अपने विचार स्वीकृत करवाए है. इससे वे सीधे तौर पर माओ ज़ेडोंग और डेंग शिओपिंग के बाद विचारकों की सूची में शामिल हो गये है. चीनी मीडिया में भी सुर्ख़ियों में ‘शी जिनपिंग विचार’ शामिल हो चुका है.
शी जिनपिंग की मंशा किस प्रकार से ‘चीनी क्रांतिकारी वामपंथियों की श्रेणी में शामिल होने कि थी इसका अंदाज़ा उसी वक़्त मिल गया था जब जून 2014 के दौरान उन्होंने पार्टी के सैद्धांतिक मुख्यपत्र ‘कुई शी’ (सच की खोज) में उन्हें ‘चीन के सबसे महान वामपंथी नेताओ’ में से एक कहा गया था, जिन्होंने ‘नई सोच, नये विचार और नये निष्कर्ष’ दिए. जून 2017 में शी जिनपिंग के विचारों को पार्टी के संविधान में सम्मिलित करने कि पहल शुरू हुई थी. सीसीपी के आधिकारिक मुख्यपत्र ‘पीपल्स डेली’ के विदेशी सोशल मीडिया हैंडल्स पर यह खुलासा हुआ की सीसीपी की केंद्र कमिटी (सी सी ) के निदेशक ली जहंशु ने यह ऐलान किया की राष्ट्रपति शी जिनपिंग की राजनैतिक विचारधारा लगभग परिपूर्ण है. उनके द्वारा कई भाषणों में शी जिनपिंग की राजनैतिक बुद्धिमता की प्रशंसा भी कि गयी. 19वीं पार्टी कांग्रेस के दौरान 31 प्रान्त व् अन्य संगठनों के पार्टी सचिवों ने ‘पीपल्स डेली’ के लिए हस्ताक्षर समेत कई लेख भी लिखे.
19वीं पार्टी कांग्रेस में शी जिनपिंग के कई वफादारों की नियुक्ति, जो आज पीबीएससी, पीबी, सीसीपी, सीसी सचिवालय एवं सीएमसी में बहुमत में है, यह ज़ाहिर करती है कि शी जिनपिंग ने जिस अधिकार और प्रभाव की उम्मीद की थी वे आज उसे हाँसिल कर चुके है. इसी संदर्भ में यह कहना गलत नही होगा कि चीनी मीडिया द्वारा, 19वीं कांग्रेस संपन्न होने के कुछ हफ़्तों पहले से इस बात पर बेहद जोर दिया जा रहा था कि किस तरह भ्रष्टाचार-विरोधी-अभियान चीन में बेहद सफल रहा. साथ ही कांग्रेस के दौरान ही चीनी सुरक्षा नियामक आयोग (चाइना सिक्यूरिटी रेगुलेटरी कमिशन) के अध्यक्ष लियु शियु का यह बयान देना कि “ शी जिनपिंग ने भ्रष्टाचार में लिप्त उच्च-अधिकारी, जो की पार्टी द्वारा दी गयी शक्ति का दुरूपयोग सत्ता के लिए करते है, उनको निलंबित करके समाजवाद का संरक्षण किया है.” और शी जिनपिंग को ‘वामपंथियों के रक्षक’ शीर्षक से नवाजना अपने आप में एक पुष्टि है. लियु शियु को बढ़ावा देते हुए सीसीपी सिसी बना दिया गया.
पीबीएससी में शामिल नये नेताओ की भागेदारी काफी रोचक है जिनकी संख्या अभी सात ही है. नये पीबीएससी के गठन होने के तरीके से यह साफ़ है की शी जिनपिंग ने पार्टी के अनौपचारिक नियमो का पालन किया है और वरिष्ठ नेताओ की सेवा-निवृति के नियमों में काफी छूट रखी है. साथ ही उन्होंने पार्टी में नौजवानों को शामिल करने को लेकर ढीला रुख अपनाया है जो भविष्य में उनके वारिस बन सकते है. इस तरह अगली पीबीएससी में नवीनीकरण की सम्भावना अब शी जिनपिंग एवं ली केकुइंग के वारिस के तौर पर पार्टी के कई युवाओं के लिए छोड़ दी गयी है. साथ ही सम्भावना ये भी है कि शी जिनपिंग दफ्तर में बने रह सकते है जैसा कि उनके कई साथी 2013 से लगातार कह रहे है. चीन अब माओ ज़ेडोंग और डेंग शिओपिंग जैसे ही नये-तीस-वर्षीय युग में प्रवेश कर चुका है
पहले जैसे ही इस नई पीबी में 25 सदस्य है. सात पीबीएससी सदस्यों के अलावा शी जिनपिंग को अन्य पीबी सदस्यों का भी बहुमत प्राप्त है. इनमे से कम से कम 12 लम्बे समय से शी जिनपिंग के वफादार है. इसमें दोनों उपाध्यक्ष शामिल नही है जो लम्बे समय से शी जिनपिंग के साथ काम कर चुके है और उनके बेहद करीबी है. इनमे से कई सदस्य केंद्र पार्टी से जुड़े संगठनों के प्रमुख का पद प्राप्त करने कि ओर अग्रसर है.
सीसीपी सीसी सचिवालय भी उतना ही महत्वपूर्ण है. पिछले पांच वर्षों में शी जिनपिंग के कार्यकाल में ये बेहद शक्तिशाली बन चुका है. यह सीधे शी जिनपिंग से मुखाबिर होता है. शी जिनपिंग ने सात सदस्यों वाले इस सीसीपी सीसी को अपने वफादार और नए लोगों से भर दिया है. वांग हनिंग इसके सबसे वरिष्ठ सदस्य है. इससे पूर्व 18वीं सीसीपी सीसी को लिऊ यूनशेन का नेतृत्व प्राप्त था जैसे अब वांग हनिंग को है. वे विचारधारा, प्रोपगेंडा से जुडी सामग्री का नियोजन और पार्टी संगठन के प्रभारी है. सचिवालय सदस्यों में से तीन व्यक्ति सेना अथवा सुरक्षा की पृष्ठभूमि रखते है. इनमे यांग शिओडू, गुओ शेंकुन, हुआंग कन्मिंग शामिल है. इससे यह ज़ाहिर होता है की पार्टी का नियंत्रण इन क्षेत्रों पर अधिक रूप से कठिन होता जायेगा.
लगभग दो सदस्यों की पृष्ठभूमि तिब्बती-मसलों से जुडी हुई है. वांग हुनिंग, नेशनल पीपल्स कांग्रेस के तिब्बत ऑटोनोमस रीजन (टार) प्रतिनिधि के सदस्य रह चुके है. यांग शिओडू ‘सेंट डाउन यूथ इन कल्चरल रेवोलुशन’ और कुछ समय पहले तक टार के निगरानी मंत्री (1976-2001) रह चुके है. गुओ शेंगकुन जो बतौर जन-सुरक्षा मंत्री कार्यरत रहे, तिब्बत में लघु-कार्य समूह से जुड़ी सभाओ में उपस्थित रहे है.
हुआंग कुनमिंग, एक अन्य सदस्य है जिन्होंने पीएलए में अपनी सेवाएं दी है. जैसी कि उम्मीद थी, टार पार्टी के सचिव वू यिंगजी को 19वीं सीसी में पूर्ण सदस्य के तौर पर बढ़ोतरी प्रदान की गयी है. इसके साथ ही इस वर्ष दो मूल-तिब्बतियों की ज्हाला (चोएड़क) एवं लुओसँग जिआनकुन (लोबसांग ज्ञाल्त्सेन), को भी पूर्ण सदस्य के तौर पर शामिल किया गया जो पिछले सीसी से एक ज्यादा है. नोरबू धोंदुप को सीसी के वैकल्पिक सदस्य के रूप में शामिल किया गया. सुन चुलान जो सीसीपी सीसी यूनाइटेड फ्रंट वर्क डिपार्टमेंट (युएफ़डब्ल्यूडी) की प्रमुख है और तिब्बती मसलों को देखती है वे 67 वर्ष की आयु प्राप्त करने के बाद अब भी पीबी की एकलौती महिला सदस्य है. उनकी उम्र उनको सेवा-निवृति के योग्य बनाती है.
1951 में पैदा हुए जहाँग किंगली जो टार में कठोर पार्टी सचिव होने और दलाई लामा पर आपत्तिजनक टिप्पणियां करने के लिए मशहूर है, वे 19वीं सीसी के पूर्ण सदस्य है. जहाँग यिजिओंग, जो वर्तमान में यूएफ़डब्ल्यूडी के उप-प्रमुख और उप मंत्री है, साथ ही जिन्हें 19वीं पार्टी कांग्रेस में चीन की दलाई लामा के प्रति नई शक्तिशाली नीतियों को प्रमुखतः से सामने रखा उन्हें भी 18वीं सीसी में वैकल्पिक सदस्य से 19वीं सीसी में पूर्ण सदस्य बनाया गया है. इन सभी की तिब्बत सम्बन्धी नीतियों के निर्धारण में एक अहम भूमिका होगी.
नये सीएमसी में ऐसे कई सैन्य-सदस्य है जो शी जिनपिंग के कट्टर समर्थक है. नये सीएमसी के आकर और रचना में भी काफी बदलाव आया है. वर्तमान में इसमें केवल चार-सदस्य है और अन्य सेवाएं जैसे पीएलए वायु सेना, पीएलएनौसेना, आदि इसमें शामिल नही है. सीएमसी के दो उपाध्यक्ष, पूर्व-पीएलएफ कमांडर शु कीलीआंग एवं पीएलए जनरल जहाँग यूक्सिया, जिनपिंग के साथ लम्बे समय से जुड़े होने के कारण काफी ‘राजशाही’ है. सीएमसी के नये उपाध्यक्ष जहाँग यूक्सिया के पिता जहाँग जोंग्शुन शी जिनपिंग के पिता के साथ युद्ध में थे और वे ‘खून में भागीदार’ कहलाते थे. जहाँग यूक्सिया सीनों-वियतनाम युद्ध 1979 में साथ थे.
शु किलांग, जहाँग यूक्सिया एवं पीएलए राकेट फ़ोर्स के कमांडर वेई फेंघे का सीएमसी में मौजूद होना इस बात कि ओर इशारा करता है कि रक्षा, सैन्य-अभियान में तकनीक के आधुनिक विकास पर अधिक ध्यान केन्द्रित किया जायेगा. जनरल ली ज़ुओचेंग, सीसीएम के जॉइंट स्टाफ डिपार्टमेंट के प्रमुख और लेफ्टिनेंट जनरल जहाँग शेंग्मिन, पीएलए अनुशासन निरक्षण आयोग के प्रमुख को शामिल करने से यह भी साफ़ है की शी जिनपिंग बेहद ‘स्वच्छ’ और भ्रष्टाचार मुक्त सेना पर जोर देंगे. जहाँग शेंग्मिन, दिलचस्प रूप से पहले सेना में 52वीं, 55वीं, 56वीं सेकंड आर्टिलेरी के बेस में लानझोऊ सेना क्षेत्र में रह चुके है और 2012-13 में सेकंड आर्टिलेरी कमांड कॉलेज के राजनैतिक माह्सचिव रहे है. जनरल माओ हुआ, बतौर सीएमसी के राजनीतिक कार्य विभाग के प्रमुख, शी जिनपिंग के पार्टी को नियंत्रित करने, सेना पर निगरानी करने के साथ ही यह भी सुनिश्चित करेंगे की चीनी सैनिक विशेषज्ञ हो सके.
सीसीपी में हुई नई नियुक्तियों से शी जिनपिंग को अपने महत्वकांक्षी एजेंडे को प्राप्त करने में काफी सहायता मिलेगी. वो बिना किसी विशेष परेशानी के ‘टू हंड्रेड’ नामक ‘चीनी सपने’ को साकार करने में सफल हो पाएंगे (2021 तक, जो संयोग से सीसीपी का शताब्दी वर्ष भी है.) और चीन को आधुनिक रूप से विकसित देश बनाने में भी सफल होंगे( 2049 या पीपल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना (पीआरसी) के शताब्दी वर्ष तक.) इसके साथ ही यह सम्भावना भी बढती है की वे अपना कार्यकाल बढ़ा लेंगे.
19वीं पार्टी कांग्रेस की कुछ विशेषताएं भी रही. पार्टी, चीन और सेना का उल्लेख अनेक बार बेल्ट और रोड के विशेष सन्दर्भ में जिनपिंग की कार्य रिपोर्ट में किया गया था. वहीँ अर्थव्यवस्था, बदलाव और विकास का जिक्र बेहद सीमित था. शी जिनपिंग ने पहली बार चीन के दूसरे और विकास के आखिरी पड़ाव का जिक्र किया और पीएलए को विश्व-स्तरीय सेना बनाने की बात भी कही. इस वर्ष की रिपोर्ट में ‘पीएलए’ और ‘सेना’ शब्द का उपयोग, अनेक स्थानों पर विशेष सन्दर्भ के साथ किया गया था, जो 17वीं और 18वीं कांग्रेस की रिपोर्ट में इस्तेमाल होने वाली संख्या का दुगना है.
शी जिनपिंग की 19वीं कांग्रेस की कार्य रिपोर्ट में 86 बार इसका जिक्र था. वहीँ 18वीं और 17वीं पार्टी कांग्रेस की रिपोर्ट में इसका 49 और 54 बार क्रमशः जिक्र किया गया था. शी जिनपिंग ने इस बात का ऐलान भी किया की सेना का केंद्र ‘चीनी सपना’ होगा, जिसके लिए इन्हें हर नई परिस्थिति में नई रणनीति बनानी होगी. जबकि रक्षा एवं सैन्य-आधुनिकरण को बढ़ावा दिया जायेगा. उन्होंने यह साफ़ करते हुए कहा की 2020 तक मशीनीकरण के लक्ष्य को पूरा कर लिया जायेगा और 2035 तक राष्ट्रीय सुरक्षा एवं सेना का आधुनिकरण भी हो जायेगा. जिनपिंग कहते है “सेना ने एक लम्बा फासला तय किया है और काफी सुधार भी किया है”. उन्होंने तकनीक को पीएलए की युद्ध-निति का अहम भाग बताया.
शी जिनपिंग कहते है की उनका मकसद पीएलए को एक विश्व-स्तरीय सेना बनाने का है जो 2050 तक लड़ कर जीतने में माहिरता हाँसिल कर सके. इसी समयावधि में चीन का बीआरआई भी पूरा होना तय हुआ है जिससे चीन एक अहम वैश्विक प्रभाव कायम क्र लेगा. जिनपिंग ने जोर देते हुए पीएलए को पीपल्स आर्मी, यानी लोगों की सेना, कहा.
हांगकांग, मकाउ और ताइवान पर कुछ नीतियों में कोई बदलाव नही होगा. ताईवान के सन्दर्भ में जिनपिंग कहते है “ हमें ताइवान की आजादी के लिए किये जा रहे अलगाववादी प्रयासों को आत्मविश्वास और प्रयासों के साथ रोकना होगा. हम कभी भी, किसी भी संगठन, राजनैतिक दल को किसी भी प्रकार से चीनी क्षेत्र को चीन से अलग करने का प्रयास नही करने देंगे.” उन्होंने कहा की “सीसीपी चीन की संप्रभुता एवं क्षेत्रीय अखंडता को बनाये रखने के लिए प्रतिबद्ध है और हम देश के विभाजन कि ऐतिहासिक गलती को दोबारा नही होने देंगे”.
कार्य रिपोर्ट में “ पार्टी के नेतृत्व का देश के प्रत्येक क्षेत्र से जुड़े कार्यों में प्रयोग करने’ पर बेहद जोर दिया गया था जिससे साफ़ है की पार्टी का विस्तार होगा और विचारधारा इसमें सबसे ऊपर होगी. शी जिनपिंग ने भी इस बात पर जोर दिया की ‘पार्टी के नेतृत्व और नीव को मजबूत बनाने के लिए’ काफी ‘प्रयास किये गये है’ और ‘पश्च्य लोकतंत्र’ पर कोई टिपण्णी नही दर्ज कि. पिछली आठ कांग्रेस कि कार्य रिपोर्ट की तुलना में इस बार 331 बार विशेष सन्दर्भ में ‘पार्टी’ शब्द का इस्तेमाल हुआ है, जो कि कहीं अधिक है.
आख़िरकार जिनपिंग ने अपने पास पद और शक्ति के मामले में कोई कमीपेशी नही रखी. पीबी की अक्टूबर 27 को पहली सभा में जारी आधिकारिक अधिसूचना में शी जिनपिंग को औपचारिक तौर पर सत्ताधारी वामपंथी पार्टी के नेता ‘लिंग्श्यु’ के तौर पर स्वीकृत कर लिया गया (लिंग्शियु – नेता के लिए आम तौर पर चीनी में प्रयोग होने वाले शब्द ‘लिंगाडो’, ‘लिंगजी’, से भिन्न है). साथ ही इस बारे में सभी को सूचित कर दिया गया है की सभी पीबी सदस्य अपने तहत आने वाले संघठनों और कैडरों की जांच करेंगे और उनकी एक वार्षिक रिपोर्ट भी जारी करेंगे जो न केवल सम्बंधित केंद्र पार्टी संगठन को जाएगी बल्कि पार्टी के महासचिव शी जिनपिंग के पास भी जाएगी. उन्होंने पहले ही यह घोषणा कर दी है कि भ्रष्टाचार-विरोधी अभियान अभी भी जारी रहेगा. उन्होंने अपने लंबे समय से अपने करीबी रहे झाओ लेजी को केंद्रीय अनुशासन एवं निरक्षण कमिटी का प्रमुख बनाया है जो पीबीएससी के सदस्य भी है.
25 अक्टूबर 2017 को सरकारी-आधिपत्य वाले ‘ग्लोबल टाइम्स’ के माध्यम से यह भी सामने आया है कि चीन को 2050 तक एक आधुनिक समाजवादी देश के रूप में स्थापित करने का लक्ष्य जिनपिंग द्वारा साधा गया है. यह कहते हुए कि “कई पश्चिमी लोगों को चीन का यह आत्मविश्वास चुनौतीपूर्ण लग सकता है”, वे कहते है कि “यही उनके लिए मौका है और इन लोगों को चीन के लिए अपना दिल खोलना चाहिए.” इस बात को भी मजबूती से रखा गया कि चीन केवल एक आधुनिक सेना वाला मजबूत देश नही होगा, बल्कि एक ऐसा देश बनेगा जो शांति, पर्यावरण का संतुलन बनाये रखने और लोकतंत्र को प्राप्त करने के प्रति अग्रसर होगा. ‘यह आधुनिक देश अपने देशवासियों के लिए प्रतिबद्ध होना पसंद करेगा बजाये इसके कि वे पूरे विश्व में अर्थव्यवस्था का नायकत्व स्थापित करने हेतु बदला लेने में जुटे रहे’.
साथ ही उन्होंने ये चेतावनी भी दी, “चीन इस नये समाजवादिकरण के दौरान किसी प्रकार की बाधा को सहन नही करेगा”, “अगर किसी भी कारणवश, किसी बाह्य ताकत ने चीन के शांतिपूर्ण विकास में खलल डालने की कोशिश की तो चीन उसका मुहँ-तोड़ जवाब देगा और यदि जरूरत पड़ी तो अपनी पूरी क्षमता से उस बाह्य ताकत पर आघात करेगा, जाहिर है इससे 2050 तक के लिए तय किये लक्ष्य पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा.” साथ ही उसने यह भी कहा “जब चीनी अधिरोहण पूरा होगा, वह पल इंसानियत के लिए बेहद खास होगा. विकास का यह ऐसा रूप होगा जो जंगल के कानून से बिल्कुल परे होगा. एक शक्तिशाली और शांतिपूर्ण देश के रूप में वृद्धि करने का यह निश्चय हमेशा दृढ रहेगा. इसी संदर्भ में अक्टूबर 2013 में पेरिफेरल डेमोक्रेसी (परिधीय लोकतंत्र) पर हुई एक संगोष्ठी में एक प्रस्ताव पारित हुआ था जिसके तहत जो भी देश चीन के विरुद्ध जायेगा उसे लगातार गंभीर दबाव एवं विरोध का सामना करना होगा.
अतः 19वीं पार्टी कांग्रेस में कुछ सन्देश बेहद साफ़ तौर पर दिए गये है:
• चीन के सभी मामलों में पार्टी का नेतृत्व हावी रहेगा चाहे वह अर्थव्यवस्था से जुड़ा कोई मसला हो, रक्षा अथवा समाज.
• चीन इस बात को लेकर बेहद आत्मविश्ववासी है कि वह शी जिनपिंग द्वारा लक्षित किये गये विकास को 2020-2035 तक पूरा कर लेगा जिसमें चीन को वैश्विक स्तर पर आधुनिक तकनीक से प्रबल एवं विकसित देशों की सूची में शामिल करना और 2035-50 तक वह ‘वैश्विक प्रभाव’ वाला एक विकसित देश बनाना शामिल है.
• पश्च्य लोकतंत्र की अवधारणा के विरुद्ध ‘‘नये दौर में चीनी विशेषताओं से परिपूर्ण शी जिनपिंग के समाजवाद पर विचार’ एक विकल्प है.
• बीआरआई को पार्टी संविधान में सम्मिलित कर उन्होंने अब इसे राष्ट्रीय विकास उद्देश्य बना दिया है और इसका विरोध करने वालों के प्रति 25 अक्टूबर को ग्लोबल टाइम्स के जरिये चेतावनी भी दे दी गयी है जिससे इसका महत्त्व बढ़ जाता है.
(लेखक कैबिनेट सचिवालय में पूर्व-अपर सचिव है और वर्तमान में सेंटर फॉर चाइना एनालिसिस एंड स्ट्रेटेजी के अध्यक्ष है. ये उनके निजी विचार है)

Translated by: Shiwanand Dwivedi (Original Article in English)
Image Source: https://www.nytimes.com/2017/10/24/world/asia/xi-jinping-china.html

Wednesday, December 13, 2017

Celebrate Women Achievers, but remember the challenges too

Nepal: Twin City Agreement and Connectivity between Janakpur and Ayodhya

Prof Hari Bansh Jha

Background
People to people relations between Nepal and India continue unabated since time immemorial. No other two countries of the world are as much bound together as these countries in social, cultural, religious, economic and even political fields. To a larger extent, the ties between the two countries are based on the foundation shaped by the unique marriage relationships between Goddess Sita and Lord Ram in Janakpur during the Ramayana period, some ten thousand years ago.
As it is well known, Janakpur, the birthplace of Goddess Sita was the capital of Mithila; while Ayodhya, the birthplace of Lord Ram was the capital of Awadh. Ever since, both Janakpur and Ayodhya have emerged as the leading spiritual centres in this part of the world. As such, each year hundreds of thousands of devotees from Nepal, India and different other parts of the world visit these two places as pilgrims.
In fact, Janakpur and Ayodhya happen to be as holy for the Hindus as Lumbini and Bodh Gaya are for the Buddhists, Jerusalem is for the Christians and Mecca and Media are for the Muslims. And yet, regrettably, no significant efforts have ever been made for the development of Janakpur and Ayodhya. Janakpur remained as much neglected in Nepal as Ayodhya in India. No government in Nepal and India ever remained serious about the development of these two spiritual centres, though their role in fostering amicable relations between Nepal and India has been unparalleled.
However, in the modern history of Janakpur and Ayodhya, a breakthrough was made in the relations between these two most sacred places when Queen Vrisha Bhanu of Tikamgarh in India constructed world renowned Janaki Temple in Janakpur in 1910 AD Around the same period she also constructed Ram Temple in Ayodhya, which is also called Kanak Bhawan.
Because of its general neglect for centuries, the holy city of Janakpur, with a population of 169,287 (2015), is hard pressed by a range of civic problems ranging from mosquitoes, absence of proper drainage system, mismanagement in garbage collection and its disposal, absence of landfill sites, pathetic hygienic environment etc. in the city generally and at the historic Janaki Temple. The temples and ponds which reflect the spiritual environment of Janakpur are badly encroached. The ponds, in general, are heavily polluted. Problems get compounded by extended periods of load-shedding. Janakpur Railway, the only railway line in Nepal that connected Janakpur with the bordering Indian town of Jaynagar, has not yet been made operational. Not much effort has been made to convert Janakpur Airport into an international airport. These have adversely affected the local economy and also pose immense inconvenience to the thousands of pilgrims coming to the city from far and wide.
ADB’s Janakpur Development Project
Recently, the Asian Development Bank (ADB) under its Integrated Urban Development Project (IUDP), has started work at Janakpur under a two billion rupees plan for the development of infrastructure including construction of roads, drainage and solid waste management. Additionally, community development programme is also part and parcel of this project. However, the common people of Janakpur are not satisfied with the pace and quality of work.
The Twin City Agreement
Indian Prime Minister Narendra Modi visualised the role of Janakpur and Ayodhya in strengthening the traditional ties between Nepal and India. During his second visit to Nepal, on November 25, 2014, a landmark agreement was signed between the two countries for the development of Janakpur and Ayodhya as twin cities. This generated a new hope as it did not merely represent the aspirations of any particular individual or society, but that of over a billion plus Hindus at the global level. Echoing this sentiment, Nitin Gadkari, India’s Minister of Road Transport and Highways announced the construction of “Ram Janaki Marg” to link Janakpur and Ayodhya for which the government of India allocated IRs. 2,000 crore.
Janakpur and Ayodhya municipalities were expected to form committees, appoint nodal officers, seek people’s participation and mobilize funds from domestic and foreign sources for launching developmental activities relating to infrastructure, environment, shelter, education, culture, sports, water treatment, solid management, public health, science and technology, urban and regional planning, tourism and heritage management. Additionally, the agreement has made provision for the exchange of delegations and promotion of interaction at the institutional level between Janakpur and Ayodhya.
To enable the Janakpur and Ayodhya municipalities in carrying out needed work, both the governments of Nepal and India were asked to hold regular meetings, form ‘Joint Action Plan’ and mobilize necessary ‘financial resources’ for the execution of the projects. The two governments were also expected to undertake a joint initiative to develop modalities for collaboration with other international cities.
The twin city agreement that was signed three years ago, was to end on November 24, 2017, unless renewed. Regrettably, over the last three years, no visible progress has been made towards fulfillment of the vision of establishing a vibrant twin-city arrangement.
Historical Perspective of Janakpur – Ayodhya Connectivity
It was during the Islamic and British rules in India that the foreign rulers had tried to destroy the glorious spiritual values of Janakpur and Ayodhya. History stands testimony to the fact that during the Mughal rule in India, temples at Janakpur had been targeted in the same way as they had been targeted in Ayodhya. The case of Ram Janmbhoomi, the birthplace of Lord Ram is its clear evidence. Ever since then there was lack of initiative from both sides to develop the roads and other infrastructural facilities along the 622-km stretch between Janakpur and Ayodhya.
In course of time, people even forgot about the trace of the trail through which Lord Ram and Maharishi Vishwamitra came to Janakpur during the Sita swayambar (marriage) and the trail through which they returned to Ayodhya after the swayambar. Yet, a new beginning was made Sur Kishor Das and Chaturbhuj Giri, the two spiritually enlightened souls, took a major initiative to revive the glorious tradition of pooja of Goddess Sita and Lord Ram in Janakpur in 1657 exactly on the same site where the present-day Janaki Mandir exists. Since then, the pace of modernization of Janakpur began.
Credit in the recent time might be given to Indian scholar Ram Avatar Sharma who took a major initiative to reinvent the trails based on Ramayanic scripture through which Goddess Sita and Lord Ram travelled between Janakpur and Ayodhya. Mention of some of the important places where they stayed in course of their journey along such trails is made in his publication in Hindi ‘Jahan Jahan Ram Charan Chali Jahin’, published by Sri Ram Sanskritik Shodh Sansthan Nyas. Previously, noted Indian scholar Sachchidanand Hirananda Vatsyayan ‘Agyen,’ popularly called ‘Agyen’ had made a meticulous contribution in this area.
Additional Aspects of the Twin-City Project
The twin city agreement will be more meaningful if connectivity between Janakpur and Ayodhya is also developed through the railways, airways and optical fibre, apart from the roads. Towards this end, the bus service could also be resumed between Janakpur and Ayodhya on a weekly, if not on the daily basis, in the beginning.
It is argued that if bus connectivity can be introduced between Kathmandu and New Delhi, apart from some other cities of the two countries, there is no reason why direct bus service cannot be resumed between Janakpur and Ayodhya via the trails through which Goddess Sita and Lord Ram travelled. It is most likely that most of the Hindus will like to travel between the two holy cities through this road called Ram Janaki Marg as announced by Minister Nitin Gadkari. Subsequently, Nepal and India could also work on Janakpur-Sitamarhi track that will cut short time and distance between Janakpur and Ayodhya. Such an initiative would help Sitamarhi emerge as a major pilgrimage destination for the Nepalese and Indian tourists. Significantly, Goddess Sita had appeared at Sitamarhi when King Siradhawj Janak was tilling the land.
As the broad-gauge railway line between Janakpur and Jaynagar is likely to be completed in the next few months, the two governments could also to introduce direct rail service between the twin cities (Janakpur and Ayodhya). There is also a strong case for developing air connectivity between the two cities by constructing a new airport at Ayodhya and upgrading the facilities at Janakpur airport. It is important that Ashrams, inns, hotels, and lodges are built with modern amenities to cater to the needs of the pilgrims and tourists of various income brackets. Other important aspects of the twin-city project could be establishment of communication connectivity, opening radio/TV channels at both the ends, broadband/optical fibre connectivity etc.
Wider and cleaner roads, greenery and above all clean temples, ponds and rivers in and around Janakpur and Ayodhya would further enhance peace and tranquillity in the region. Also, it is important to make museums, Yoga and meditation centres in Janakpur and Ayodhya, apart from the regular presentation of ‘Sita Leela’. Spiritual discourses on Sitayan, the life of Goddess Sita and Ramayan, the life of Lord Ram, apart from those on King Janak, Astabakra, Gargi and other saints and sages of the regions could also go a long way in creating spiritual environment
Poverty in Janakpur-Ayodhya regions is more likely to be reduced with the development of infrastructural and communication facilities. A number of tirthatan (tourist) hubs are likely to grow on the 622-km stretch of road between Janakpur and Ayodhya. Such activities are likely to change the poverty-stricken and fragile zone between Janakpur and Ayodhya into economically most prosperous regions.
Conclusion
Janakpur-Ayodhya relations are pivotal for reviving the strong cultural and civilizational links between Nepal and India. As such, the twin city development agreement should not be allowed to lapse due to the lack of political will and passive attitude of both governments. Against this backdrop, it is necessary for the newly elected Mayors of Janakpur and Ayodhya to take fresh initiatives to see that the agreement on the twin city development is renewed and work on different activities are launched effectively and completed within the given timeframe. The ADB supported projects should be integrated with the twin city concept and implemented without any further delay.
With growing all round connectivity between the two cities, prospects of growth of agriculture, industrial, trade and service sectors, will increase and millions of people in the region will get employment opportunities which would finally raise their standard of living of the people. Such activities would not only link the two cities and boost up local economies but it would also strengthen the unique ties between Nepal and India further.
(Dr. Jha is Executive Director of Centre for Economic and Technical Studies in Nepal)
(Views expressed are of the author and do not necessarily reflect the views of the VIF)

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Tuesday, December 12, 2017

H.E. Mr. Sergey V Lavrov, Minister for Foreign Affairs, the Russian Federation, delivers the First Kadakin Memorial Lecture at the Vivekananda International Foundation, New Delhi, 11 December 2017

His Excellency Sergey V Lavrov, Minister of Foreign Affairs of the Russian Federation, delivered the First Kadakin Memorial Lecture at the Vivekananda International Foundation (VIF) on 11 December 2017, to a select gathering that comprised India’s national Security Advisor (NSA), Mr. Ajit Doval, Foreign Secretary, Dr. S Jaishankar, members of the diplomatic corps, members of the strategic community and media. The special lecture titled, ‘Global Affairs and New Vistas of Russian-Indian Cooperation’, has been instituted in memory of former Russian Ambassador to India, Alexander Kadakin who served at New Delhi since 2009 until his demise in January 2017.
H.E. Lavrov began his lecture by recalling Ambassador Kadakin, his commendable role in cementing India-Russia relations and for being a true friend of India. Starting his career as Third Secretary at the Russian Embassy in New Delhi in 1972, Kadakin served in India on many occasions, including as Ambassador earlier from 1999 to 2004 and the as Minister Counselor between 1989 and 1992. He spoke fluent Hindi and served as translator for Soviet Premier Leonid Brezhnev’s official visits to India in the 1970’s.
A major part of the visiting foreign minister’s address was devoted to India-Russia relations both in the bilateral and multi-lateral arena. On global issues, he emphasized the importance of joint Indian-Russian initiatives within various multilateral frameworks like the Brazil, Russia, India, China and South Africa Grouping (BRICS), the Shanghai Cooperation Organization (SCO) and the Russia, India, China (RIC) Dialogue.
SCO and One Belt One Road (OBOR)
The Foreign Minister specifically stressed upon the importance of the SCO said that Russian welcomes India into the SCO as an important country in promoting multilateral political, security economic and people-to-people interaction within the group and to foster a stronger Eurasian Union. He also was optimistic about Pakistan’s inclusion in the SCO along with India and felt that the SCO could emerge as an important grouping for dispute resolution between India and Pakistan.
Talking at length on OBOR, the Minister said that Russia feels the concept is very interesting that could emerge as an important mechanism for building harmonious relationships and to facilitate deeper regional trade and investment. H.E. Lavrov said that almost all the central Asian countries have already signed contracts with China for cooperation in the OBOR while Russia and other members of the Eurasian Economic Union have also concluded economic cooperation agreements with it.
Afghanistan
Foreign Minister Lavrov stressed the importance of a multilateral region-led interaction to stabilize Afghanistan. He recognized the legitimacy of the current Afghan Government and mentioned all those multilateral organizations which consist of Afghanistan’s neighbouring countries and other regional states - such as participants of the SCO, the Moscow format, the Heart of Asia-Istanbul Process, the Kabul Process and the Regional Economic Cooperation Conference on Afghanistan - as integral to settling the Afghan problem. His views on the Taliban were candid when he mentioned that the role of the Taliban in stabilizing Afghanistan could not be overlooked but that they would have to accept norms and rules laid down by the UN. He disagreed with the US policy on Afghanistan and said that the US was compromising on UN mandated norms. H.E. Lavrov denied that Russia had supplied arms to the Taliban though he accepted some contacts with them purely for the release of hostages.
Asia-Pacific
H.E. Lavrov also spoke about a common Russian and Indian vision for the Asia-Pacific and in maintaining regional security and economic architecture that is open, inclusive, and based on multilateralism, universally recognized principles of international law, and that are imperative for lasting peace and stability in the region. In this regard he reiterated the commitment of both the nations to further promote dialogue on regional security architecture including within the East Asia Summit framework.
The Minister lauded India's independent foreign policy approach, but in an indirect reference to the ‘Quadrilateral’ , he said, "We believe that sustainable security architecture in the Asia Pacific region cannot be achieved through bloc arrangement and is only possible through an open ended collective basis." The Russian Foreign Minister also talked about the need for peaceful settlement of the disputes, saying that use of force or threatening to use force will not resolve any issue. Calling India a key partner for Russia, he said further strengthening of ties between the two countries can address numerous problems in the Asia Pacific region.
Terrorism
Foreign Minister Lavrov made special mention of the scourge of terrorism and spoke of the common need to combat ideological dimensions of international terrorism. He further said that Russia and India both “condemn terrorism in all its forms and manifestations including the recent heinous terrorist attacks around the world and reaffirm our determination to prevent and counter terrorism in all its forms and manifestations. We reaffirm that all acts of terrorism are criminal and unjustifiable irrespective of their motivations, committed wherever and by whomsoever.” He emphasized the need for a comprehensive approach in combating terrorism, and in this context resolve to step up cooperation to prevent and counter terrorism and radicalization, combat the spread of terrorist ideology and propaganda and stop sources of terrorist financing. He said that India and Russia were on the same page is stabilizing Afghanistan and here we should not become victims of the Western discourse that sometimes tends to plant misleading stories.
Bilateral Issues
In the bilateral domain, the Minister recommended the need to build an economic stake by both Governments to take this relationship to the next level as both countries had pledged to take their bilateral trade to 30 billion dollars over the next few years. He said that both countries recognize the importance of increasing the efficiency of existing economic cooperation mechanisms at all levels – by encouraging direct contacts between the business communities of the two countries. Both need to look at ways to strengthen industrial cooperation and create close technological alliances and integrated manufacturing chains in those sectors where both Russia and India have significant capacities in terms of personnel and resources. Here, he emphasized Russia’s commitment to eventually ensure flow of technology to assist the ‘Make in India’ programme of the present Government.
The Minister concluded his address by mentioning that India and Russia have coinciding priorities, and therefore, both Governments should encourage their respective communities to engage with one another through greater economic engagement, stepping up of people to people contacts and educational and cultural exchanges in a more robust environment.
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मोदी के मनिला दौरे का विवरण

Amb Satish Chandra, Dean, Centre for National Security and Strategic Studies, VIF

जैसा कि प्रत्येक विदेश दौरे में होता आया है उसे कायम रखते हुए इस बार भी प्रधानमंत्री ने मनिला के अपने दौरे से देश को गौरवान्वित किया है.
अलग-अलग कार्यक्रमों में भागीदारी के साथ ही एक कर्मशील एजेंड़े को ध्यान में रखते हुए प्रधानमंत्री ने आशियान का उद्घाटन समारोह, 12वाँ आशियान समारोह, आशियान बिज़नेस एवं इन्वेस्टमेंट समिट और 12वें पूर्वी-एशिया समिट में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई. कई बड़े नेताओ की उपस्थति में ,अनेक दिपक्षीय एवं एकल बैठकों की मेजबानी करते हुए प्रधानमंत्री ने भारत को आशियान के एक गंभीर, सक्रिय सदस्य के तौर पर प्रस्तुत किया जो मित्रवत होने के साथ ही अपनी सुरक्षा सम्बन्धी मसलों पर बेहद सख्त है और इसको मजबूत करने वाली नियम-आधारित आधारभूत संरचना को विकसित करने हेतु अग्रसर है। प्रधानमंत्री की टिप्पणियों एवं उनके भाषण से हम भारत के आशियान समिट में भागीदारी को लेकर कुछ मुख्य बिंदु इस प्रकार से संदर्भित कर सकते है:-
• एशियान, हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में घरेलू सुरक्षा हेतु आधारभूत संरचना को विकसित करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. भारत की पूर्व-देखो निति में भी इसका अहम योगदान है.
• आशियान द्वारा भारत यह सुनिश्चिता प्रदान करता है जिसके तहत की वह क्षेत्रीय हितों को बल प्रदान करने और शांतिपूर्ण विकास को बढ़ावा देने हेतु नियम-आधारित आधारभूत संरचना का निर्माण करेगा.
• भारत और आशियान का घनिष्ठ सहयोग,मुख्यतः तीन स्तम्भों पर आधारित है : राजनैतिक सुरक्षा, आर्थिकी एवं संस्कृतिक साझेदारी.
• कट्टरपंथ एवं आतंकवाद के विरुद्ध भी भारत और आशियान को एक साथ खड़ा होना चाहिए.
• भारत का आशियान से जुड़ाव हमेशा से बना रहा है और इसे आगे और भी मज़बूती प्रदान की जाएगी. इसी की शुरुआत करते हुए भारत की राजधानी दिल्ली में दिसम्बर 2017 में आशियान-इंडिया कनेक्टिविटी समिट का आयोजन किया जायेगा जिसमें आशियान देशों से जुड़े मंत्री, कारोबारी, अफ़सर प्रतिनिधि आदि भाग लेंगे.
जनवरी 2018 में आशियान के बड़े नेताओं के लिए आयोजित होने वाले इंडिया आशियान कोमेमोरेटिव समिट के साथ ही भारत आशियान-भारत बिज़नेस एंड इन्वेस्टमेंट मीट एंड एक्सपो भी आयोजित करेगा. भारत,आशियान की बढ़ोत्तरी में भागीदार बनना चाहता है और आशियान की ओर से भी इसी तरह कि पहल की उम्मीद रखता है.
भारत-फिलीपींस की द्विपक्षीय वार्ता के दौरान जिन चार समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर हुए उनमें उल्लेखित बिंदुओं पर यदि नज़र डालें तो हम यह आसानी से समझ सकते है की भारत के आशियान से क्या सम्बन्ध रहे होंगे. पहले समझौता ज्ञापन में रक्षा, रसद एवं सहयोग, मानवीय आधारों पर सहायता, आपदा-प्रबंधन आदि सम्मलित है तो वही दूसरे में कृषि सम्मिलित है. तृतीय ज्ञापन में कुटीर,लघु एवं मध्य उद्योग शामिल है. चौथे एवं अंतिम ज्ञापन में इंडियन काउंसिल ऑफ़ वर्ल्ड अफेयर्स एवं फिलीपींस सर्विस इंस्टिट्यूट के बीच एक समझौता तय हुआ है.
मोदी की मनिला दौरे से पहले की शाम को एक अहम बात यह हुई की, अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया एवं भारत के बीच सचिव स्तर पर एक वार्ता हुई. इस तरह की चतुर्पक्षीय बातचीत की शुरुआत जापानी प्रधानमंत्री अबे द्वारा एक दशक पहले प्रस्तावित कि गयी थी. इसके पीछे उद्देश्य यह था कि नियम आधारित सिद्धांत को लागू करते हुए क्षेत्रीय आदेश लाये जायेंगे एवं नेविगेशन (पथ-प्रदर्शन) की स्वतंत्रता के जरिये मुक्त-व्यापर को बढ़ावा दिया जा सकेगा.
2007 में भारत-अमेरिका के बीच हुए मालाबार व्यायाम जिसमे जापान और ऑस्ट्रेलिया की नौसेनाएं भी शामिल थी, ऐसे ही प्रयासों में से एक था. मगर चीन के दवाब में ऑस्ट्रेलिया को इस से पीछे हटना पड़ा और यह व्यायाम केवल अमेरिका तक सीमित रहा. उसके कुछ वर्ष बाद 2015 में जापान इसका नियमित सदस्य बना.
इस चतुर्पक्षीय वार्ता कि पहल एक बार फिर से होने की गुंजाईश है. जापान इन तीन लोकतांत्रिक देशों के साथ मिलकर रक्षा, तटीय सुरक्षा और आधार भूत संरचना के विकास हेतु चर्चा करना चाहता है. इस बातचीत के आयोजन से यह साफ़ है कि कुछ समय पहले चीनी विदेश नीति के हावी होने के कारण भारत और ऑस्ट्रेलिया पर बन रही दवाब की स्थिति में कमी आई है.
इस बात में संशय है की इन दोनों देशों का इस क्षेत्र में स्वागत होगा. हालाँकि इस क्षेत्र में चीन के विकल्प के रूप में एक शक्ति की आवश्यकता है पर भारत अकेला अभी सैन्य-शक्ति एवं आर्थिक स्तर पर इतना परिपक्व नहीं है कि इस अहम जिम्मेदारी को निभा सके. साथ ही आशियान के साथ अपने द्विपक्षीय 70 बिलियन डॉलर के आर्थिक निवेश के बाद भी भारत का हिस्सा चीन के 15 प्रतिशत निवेश से भी कम है. इन सब विषयों को मद्देनज़र रखते हुए यह जरूरी है कि भारत इस लोकतांत्रिक चौकड़ी के साथ अपने संबंधों को बेहतर करे और इस क्षेत्र कि बेहतरी और यहाँ शांति-स्थापना पर काम करे जिससे इस इलाके में चीन के आधिपत्य को चुनौती दी जा सके.
इस चौकड़ी की प्रकर्ति को संदर्भित करने के प्रयास में ऑस्ट्रेलियायी विदेश मंत्री ने विवेचना करते हुए बताया कि उन्होंने “हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में सम्पन्नता एवं रक्षा क्षेत्रों से जुड़े मसलों पर बातचीत की और इस मसले पर सभी लगभग एक जैसे ही राय रखते हैं और इस ओर काम करने का प्रयास भी करेंगें जिससे कि इस क्षेत्र को खुला और मुक्त रखा जा सके.
सम्बंधित अधिकारियों ने ऐसे कारक एवं कार्यों का निरीक्षण किया है जिससे वे समान उद्देश एवं चुनौतियों पर काम कर सकें. इसमें हिन्द-प्रशांत क्षेत्र हेतु नियम-आधारित आदेश, अंतर्राष्ट्रीय कानून का पालन, नेविगेशन एवं ओवर फ्लाइट की स्वतंत्रता, बेहतर जुड़ाव और हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में आतंकवाद के विरूद्ध कार्यवाही और समुद्री सुरक्षा जैसे अहम मुद्दों पर भी ध्यान देने कि बात कही गयी है. अधिकारियों ने एक साथ मिलकर काम करने के मत पर सहमति दर्ज कराई है जिससे कि जन-संहार के बड़े यंत्रो और हथियारों की मौजूदगी से बढ़ती चिंता, डीपीआरके के परमाणु एवं मिसाइल अभियान जैसे अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा को चुनौती देने वाले मसलों पर वे आपसी सहयोग से काम करेंगे. प्रतिभागियों ने चार देशों के बीच हुई बातचीत और सहयोग के मुद्दों के प्रति प्रतिबद्ध होना भी स्वीकार किया.
यह उम्मीद की जा रही है कि यह चौकड़ी न केवल बनी रहे बल्कि और भी फले-फूले, जिसके मायने यह है कि इसका नियमित संचालन हो। साथ ही इस उपयुक्त कार्यप्रणाली एवं यन्त्रप्रणाली के प्रयोग से चीन की ओर से उपजी दो बड़ी समस्याएं –सुरक्षा एवं बेल्ट और रोड का, सामना करने हेतू प्रयोग किया जा सके. चीन के विकल्प हेतू इन्हें कई ऐसे आकर्षक विकल्प पैदा करने की आवश्यता है जिनमें घरेलु उपज पैदा करने की क्षमता हो, जो बाह्य शक्तियों से प्रभावित न हो, पूर्ण-रूप से पारदर्शी हो और जो घरेलु अर्थव्यवस्था को संबलता प्रदान करे न कि किसी अन्य बाहरी को. साथ ही जिन्हें कठिन, जटिल शर्तों से नही अपितु बेहद उदार शर्तों पर वित्तीय पोषण प्रदान किया जा सके
भारत को अपने सारे पूर्वाग्रह से मुक्त होकर हिन्द-प्रशांत क्षेत्र की सहभागिता में सक्रिय होने के लिए इस चौकड़ी के साथ मिलकर प्रयास करने चाहिए. साथ ही इस क्षेत्रों के अन्य देशों को भी ‘नीली अर्थव्यवस्था’(ब्लू इकॉनमी ) में अधिक सहयोग बढ़ाने हेतु प्रेरित करना चाहिए. भारत की सबसे बड़ी विशेषता ही यही है की ये अन्य देश, विशेषकर की चीन जैसे आक्रमक रवैय्ये का पक्षधर नही है. इस क्षेत्र में नीली अर्थव्यवस्था पर ध्यान केन्द्रित करने का सन्देश इसलिए भी अहम है क्यूंकि महासागर यहाँ बड़े क्षेत्रफल में फैले हुए है और कई देश एक लम्बी सीमा समुद्र या महासागर के साथ बाँटते है. साथ ही हमारे सहयोग कार्यक्रम को ध्यान से इस प्रकार बनाया जाना चाहिए जिससे कि उस क्षेत्र-विशेष की घरेलु आवश्यताओं को पोषित किया जा सके. इन्हें शोषक नही बल्कि पोषक होना चाहिए जिससे की हम इन्हें तकनीक और सहयोग आसानी से उपलब्ध करवा सके. इस प्रकिया में भारत को नीली अर्थव्यवस्था के अनेकानेक अभियानों और परियोजनाओं से जुड़ने और उनमे विशेषज्ञता हाँसिल करने का मौका मिलेगा जिससे अर्थव्यवस्था को भी काफी फायदा होगा.
इन चार देशों के लक्ष्यों के स्तर पर ही इस चौकड़ी का भविष्य निर्भर करता है. साथ ही इन्हें चीन के अपरिहार्य रूप से पीछे हटने को लेकर भी संतुष्ट होना चाहिए. इसके अलावा हम अमेरिका पर अपनी निर्भरता को बढ़ावा न दे तो बेहतर है क्योंकि उसकी अपनी नीतियाँ आज प्रवाह में बह रही है. हर देश का चीन के साथ अपना अलग मसला है. अमेरिका और चीन एक दूसरे से आर्थिक रूप से जुड़े हुए है और आज दोनों ही इन योजनाओं से उन्मुख होने हेतू प्रयासरत है. यदि इस चौकड़ी को गंभीरता से कार्य करना है तो इन्हें इसकी औपचारिक पहल करनी होगी, बातचीत करनी होगी, चार्टर बनाना होगा, कार्यक्रम का विवरण तैयार करना होगा और उसके क्रियान्वन हेतु लक्ष्य निर्धारित करने होंगे. केवल तब ही इस निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है की इस समूह में और सदस्य शामिल होने चाहिए या नही. यह हिन्द-प्रशांत क्षेत्र के सुरक्षा सम्बन्धी आर्धरभूत संरचना की विकास हेतू आशियान में बातचीत की मध्यस्थता करने में भी सहायक होगा.
(लेखक वीआईएफ़ सलाहकार समिति के सदस्य है और पूर्व उप-राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार है. ये उनके निजी विचार है)

Translated by: Shiwanand Dwivedi (Original Article in English)
Image Source: http://littleindia.com/modi-trump-discuss-security-indias-greater-role-a...